नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे शिशुओं की सेहत के लिए चिंता का विषय बन रहा है। हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने का संबंध समय से पहले प्रसव और जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने जैसे जोखिमों से पाया गया है। विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं को प्रदूषण से बचने, सांस संबंधी लक्षणों को गंभीरता से लेने और नियमित प्रसवपूर्व जांच कराने की सलाह दी है।
प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। विशेषज्ञों के मुताबिक, हवा में मौजूद बेहद छोटे प्रदूषक कण शरीर में सूजन बढ़ाने और रक्त वाहिकाओं के कामकाज को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान यह स्थिति मां और गर्भस्थ शिशु, दोनों के स्वास्थ्य के लिए चिंता बढ़ा सकती है।
पीएम 2.5 से मां की सेहत पर क्या असर पड़ सकता है?
सरिता विहार स्थित अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. निखिल मोदी के अनुसार, पीएम 2.5 जैसे बारीक कण सांस के जरिए फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क से शरीर में सूजन बढ़ने और रक्त वाहिकाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका रहती है।
गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के संपर्क को उच्च रक्तचाप और प्री-एक्लेम्पसिया जैसी जटिलताओं के बढ़ते जोखिम से भी जोड़ा गया है। प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था में होने वाली एक गंभीर स्थिति है, जिसमें रक्तचाप बढ़ जाता है और मां तथा बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, प्रदूषण के संपर्क का मतलब यह नहीं है कि हर गर्भवती महिला को ऐसी जटिलताएं होंगी। जोखिम प्रदूषण के स्तर, संपर्क की अवधि और महिला की स्वास्थ्य स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।
गर्भ में पल रहे बच्चे को कैसे हो सकता है नुकसान?
गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क को बच्चे के विकास से जुड़ी कुछ समस्याओं के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है। इनमें समय से पहले जन्म और जन्म के समय कम वजन जैसी स्थितियां शामिल हैं। प्रदूषण का संपर्क गर्भस्थ शिशु के फेफड़ों के विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण के संपर्क को कम करना गर्भवती महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, सूक्ष्म कणों के प्लेसेंटा यानी अपरा को पार करके सीधे भ्रूण तक पहुंचने और उसके प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक शोध जारी हैं। इसलिए सभी संभावित प्रभावों को निश्चित मानकर नहीं चलना चाहिए।
गर्भवती महिलाएं प्रदूषण से बचने के लिए क्या करें?
प्रदूषण के दिनों में कुछ सावधानियां अपनाकर हानिकारक कणों के संपर्क को कम किया जा सकता है।
- एन95 मास्क पहनें: बाहर निकलना जरूरी हो तो चेहरे पर अच्छी तरह फिट होने वाला एन95 मास्क पहनें। इससे हवा में मौजूद बारीक कणों के संपर्क को कम करने में मदद मिल सकती है।
- एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें: घर के भीतर हवा की गुणवत्ता खराब होने पर उपयुक्त एयर प्यूरीफायर मददगार हो सकता है। कमरे में बाहर से प्रदूषित हवा आने के रास्ते भी कम रखें।
- प्रदूषण अधिक होने पर बाहर जाने से बचें: वायु गुणवत्ता खराब होने के दौरान खुले में टहलने, दौड़ने और ज्यादा मेहनत वाली गतिविधियों को सीमित रखें।
- व्यस्त सड़कों से दूरी रखें: यातायात वाले इलाकों और धुएं के अधिक संपर्क वाली जगहों पर लंबे समय तक रहने से बचें।
- नियमित जांच कराएं: डॉक्टर की सलाह के अनुसार प्रसवपूर्व जांच कराते रहें और रक्तचाप की निगरानी करवाएं।
खांसी, घरघराहट या सांस फूलने पर न करें अनदेखी
गर्भवती महिलाओं को लगातार खांसी, सांस लेते समय घरघराहट, सीने में जकड़न या सांस फूलने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से संपर्क करें। अगर अचानक या गंभीर रूप से सांस लेने में परेशानी हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
अस्थमा या सांस संबंधी दूसरी बीमारियों से पीड़ित महिलाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपनी निर्धारित दवाएं जारी रखें। प्रदूषण के डर से दवाएं खुद बंद न करें और बिना चिकित्सकीय सलाह के नई दवा भी शुरू न करें।
खानपान और नियमित देखभाल भी जरूरी
गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पानी पीना, फल और हरी सब्जियों सहित संतुलित आहार लेना और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक नियमित जांच कराना जरूरी है। हालांकि, अच्छा खानपान प्रदूषण से होने वाले नुकसान का पूरा बचाव नहीं कर सकता। इसलिए सबसे अहम कदम प्रदूषित हवा के संपर्क को यथासंभव कम करना और जरूरत पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना है।
